मंगलवार, 4 जून 2013

मुश्किल





पाने को आतुर रहतें हैं  खोने को तैयार नहीं है
 जिम्मेदारी ने
मुहँ मोड़ा सुबिधाओं की जीत हो रही.

साझा करने को ना मिलता , अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही .

कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी  है
जैसा देखा बैसी बातें  .जग की अब ये रीत हो रही ...

अब खेलों  में है  राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस्से किसकी मीत हो रही

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और  तन्हाई की जीत हो रही

 

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना


7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत खूब ...जिंदगी का एक कड़वा सच

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  2. क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
    संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही
    सच्ची - सार्थक अभिव्यक्ति

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  3. हकीक़त बयान करती रचना!
    ढ़
    --
    थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. हकीक़त बयान करती रचना!
    ढ़
    --
    थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!

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